Monday, July 20, 2009

तुम्हें क्या याद आया--

कई बार यादें बहुत तंग करती है, अगर अपने साथ छोड़ चुके हों. तो कई बार मन छोटी सी बात पर भी भारी हो जाता है. ऐसे में कुछ लिखा गया-- पेश है--

तुम्हें क्या याद आया--
तुम
अकारण रो पड़े--
हमें तो
टूटा सा दिल
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--

तुम
अकारण रो पड़े--
बारिश में भीगते
शरीरों की भीड़ में
हमें तो
बचपन
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया---

तुम
अकारण रो पड़े--
दोपहर देख
ढलती उम्र की
दहलीज़ पर
हमें तो
यौवन
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--

तुम
अकारण रो पड़े--
उदास समंदर किनारे
सूनी आँखों से
हमें तो
अधूरा सा
धरौंदा
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--

तुम
अकारण रो पड़े--
धुँधली आँखों से
सुलघती लकड़ियाँ देख
हमें तो
कोई
अपना याद आया,
तुम्हें क्या याद आया--
सुधा ओम ढींगरा

6 comments:

पंकज सुबीर said...

तुम
अकारण रो पड़े--
बारिश में भीगते
शरीरों की भीड़ में
बारिश में भीगते शरीरों की भीड़ में ये प्रयोग बहुत अच्‍छा है बहुत कुछ इंगित कर रहा है ये । आपकी सक्रियता से हूं बहुत कुछ मिलेगा । रक्षा बंधन आने को है अपने इस छोटे भाई को उस दिन याद कीजियेगा ।

AlbelaKhatri.com said...

kavita jaisee kavita
lekin
kavita se kuchh zyada kavita.................

marm k marm tak
vedna k charm tak
arthat
samvedna k charmotkarsh k bhi charm bindu tak
aapne apni abhivyakti ko sparsh kiya hai
yon lagta hai maano
shabd me pran phoonk kar
arth ko saakar kar diya ho________

____________badhhai !
____________haardik badhaai !

narinder said...

aapki kavita padhi, bahut aachi lagi.
Narender Grover

वाणी गीत said...

बहुत याद आया ..वो बचपन ..!!

pran said...

SUDHA JEE,
AAPNE YAAD DILAYA TO MUJHE YAAD AAYA
AAPKE BLOG PAR LAGEE AAPKEE PAHLEE-
PAHLEE KAVITA NE DIL KO KHOOB LUBHAYA

M VERMA said...

अधूरा सा
धरौंदा
अपना याद आया,
यादो के झुरमुट से सुन्दर रचना का सृजन हुआ है