Thursday, August 20, 2009

''हिंदी चेतना'' का नया अंक '' कामिल- बुल्के विशेषांक ''.

मित्रो,

उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका ''हिंदी चेतना'' का नया अंक

प्रकाशित हो गया है.
कामिल- बुल्के जन्मशती के उपलक्ष्य में

हिन्दी चेतना देश- विदेश में फ़ैले अपने पाठकों के लिए ले कर आई

है--जुलाई २००९ अंक '' कामिल- बुल्के विशेषांक ''.

इसे आप पढ़ सकतें हैं--


http://hindi-chetna.blogspot.com/

अथवा
http://www.vibhom.com/ publication.html
या

http://www.vibhom.com/index1.html

के online हिंदी चेतना के बटन को दबा कर खोल सकते हैं.

अपनी प्रतिक्रिया से हमें जरूर अवगत कराएँ।


सादर,

सुधा ओम ढींगरा



6 comments:

AlbelaKhatri.com said...

dhnyavaad sudhaaji,
hindi chetnaa ke nootan ank ka swaagat hai........
soochnaa k liye aabhaar !

विनीत कुमार said...

डॉ.कामिल बुल्के का नाम पढ़ते ही मुझे कई चीजें एक साथ याद आ गयी। वही संत जेवियर्स कॉलेज,रांची का हिन्दी विभाग जहां कभी बुल्के विभागाध्यक्ष हुआ करते थे। वही डॉ.कामिल बुल्के शोध संस्थान जहां नियमित जाकर मैंने बीए के हिन्दी साहित्य के नोट्स बनाए,साहित्यिक रचनाएं बैठकर पढ़ी। मुझे दीनेश्वर प्रसाद याद आ रहे हैं,बुल्के का कमरा याद आ रहा है। 17 अगस्त के दिन हम बाबा बुल्के को याद करते,शोक मनाते लेकिन उसके बाद ही लोग मुझे मेरे जन्मदिन की बधाईयां देते। कितना कुछ जुड़ा है,बाबा बुल्के के साथ। उनकी याद में लिखी गयी कविता,उनकी याद में दिए गए भाषण औऱ लोगों का मजाक कि तुम्हारे भीतर बाबा बुल्के का मन बसता हूं।
मैम मैंने पूरी पत्रिका को सरसरी तौर पर देखा। माफ कीजिएगा,मुझे बहुत मेहनत से निकाली गयी पत्रिका कहीं से भी नहीं लगी। बहुत कुछ है और बहुत से लोग हैं जो उनके बारे में नयी-नयी जानकारियां देते। जो तस्वीरें आपने लगायी हैं,उसमें अगर डॉ कामिल बुल्के शोध संस्थान की तस्वीर भी लगाते तो लोगों की जानकारी में इजाफा होता। ये देश के गिने-चुने संस्थानों में से है जहां हिन्दी और संस्कृत को लेकर इतनी सामग्री आज भी बहुत सहेजकर रखी गयी है। लगभग सारे नए प्रकाशन मंगाए जाते हैं जिसे देखकर हमलोगों को प्रेरणा मिलती रही है कि साहित्य के लिए कुछ बेहतर करना है।
कुछ नहीं तो सेल्फ पर सजी किताबों को ही कोई तरीके से पलटता तो बहुत सारी चीजें मिल जाती। एक अलग से आलेख इस शोध संस्थान पर होता तो मौजूदा साहित्य से जुड़े लोगों को साहित्य से जुड़ने के एक नए माध्यम की जानकारी मिल जाती। मैं बाबा बुल्के से बहुत गहरे स्तर पर जुड़ाव महसूस करता हूं। उनके साधनों का इस्तेमाल करते हुए साहित्यिक समझ विकसित की है इसलिए मेरी इस असहमति को भावुकता का हिस्सा मानकर माफ करेंगे।
सम्पर्क करेंगे तो हमें भी अच्छा लगेगा।
विनीत कुमार
63-ग्वायर हॉल
दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली-7
भारत
vineetdu@gmail.com
http://taanabaana.blogspot.com

Arvind Mishra said...

बहुत आभार !

Atmaram Sharma said...

अंक पढ़ लिया है.

cmpershad said...

एक विदेशी जिसने इस देश को अपनाया- कामिल बुल्के को नमन॥

पंकज सुबीर said...

दीदी प्रणाम
आप सोच रहीं होंगी कि राखी के बाद भाई कहां गायब हो गया । दरअसल में एक लम्‍बे कथ्‍य पर काम कर रहा हूं । उसी कारण कम्‍प्‍यूटर से दूर हूं । आपका आशीर्वाद चाहिये उस काम के लिये ।