Friday, October 30, 2009

नींद चली आती है.....

बाँट में,

अपने हिस्से का सब छोड़,

कोने में पड़ी

सूत से बुनी वह मंजी 


अपने साथ ले आई,

जो पुरानी, फालतू  समझ

फैंकने के इरादे से

वहाँ रखी थी.


बेरंग चारपाई को उठाते

बेवकूफ लगी थी मैं,

आँगन में पड़ी

बचपन और जवानी का

पालना थी वह.


नेत्रहीन मौसी ने

कितने प्यार से

सूत काता, अटेरा और

चौखटे को बुना था,

टोह- टोह कर रंगदार सूत

नमूनों में डाला था.


चौखटे को कस कर जब

चारपाई बनी,

तो हम बच्चे सब से

पहले उस पर कूदे थे.


उसी चारपाई पर मौसी संग

सट कर सोते थे,

सोने से पहले कहानियाँ सुनते 

और तारों भरे आकाश में,

मौसी के इशारे पर

सप्त ऋषि और आकाश गंगा ढूँढते थे.


और फिर अन्दर धंसी

मौसी की बंद आँखों में देखते--

मौसी को दिखता है----

तभी तो तारों की पहचान है.


हमारी मासूमियत पर वह हँस देती

और करवट बदल कर सो जाती,

चन्दन की खुश्बू  वाले उसके बदन

पर टाँगें रखते ही,

हम  नींद की आगोश में लुढ़क जाते.
 

चारपाई के फीके पड़े रंग

समय के धोबी पट्कों से

मौसी के चेहरे पर आईं

झुरियाँ सी लगते हैं.


जीवन की आपाधापी से

भाग जब भी उस

चारपाई पर लेटती  हूँ,

तो मौसी का

बदन बन वह 

मनुहार और दुलार देती है .


हाँ चन्दन के साथ अब 

बारिश, धूप में पड़े रहने

और त्यागने के दर्द की गंध

भी आती है,

पर उस बदन पर टांगे

फैलाते ही नींद चली आती है.....

25 comments:

पंकज सुबीर said...

स्‍तब्‍ध होकर केवल पढ़ता ही रहा । पलकों के किनारों पर कम नमी आ गई ज्ञात ही नहीं हो पाया । ऐसा लगा जैसे अपने ननिहाल में पहुंच गया हूं जहां पर रात को खुले आसमान के नीचे बान की खाट पर लेटा हूं । तब जब कि ननिहाल में बिजली नहीं पहुंची थी । अब तो खैर बिजली के साथ हर जगह टीवी नाम की बीमारी भी पहुंच चुकी है । दीदी आपकी क़लम को प्रणाम । कविता एक पूरा अध्‍याय है सुधियों का अध्‍याय ।

ललित शर्मा said...

जीवन की आपाधापी से
भाग जब भी उस
चारपाई पर लेटती हूँ,
तो मौसी का
बदन बन वह
मनुहार और दुलार देती है .
बहुत सुंदर कविता सुधा जी-आपके ब्लाग पर आकर अच्छा लगा-आभार

Dr. Smt. ajit gupta said...

इतना सीधा और सरल बचपन आज न जाने कहाँ गया? उन अभावों के दिन में कितनी खुशियां थी? आज सब कुछ है लेकिन कुछ भी समेटने को नहीं है। न कोई खटिया, न कोई मांजा और न कोई गुड़िया। बहुत अच्‍छी कविता, बधाई।

AlbelaKhatri.com said...

कोई आग पर कविता लिखे और आग में बैठ कर लिखे तो वो कविता कैसी होगी ?

कोई समन्दर पर शे'र लिखे और लहरों में बहते हुए लिखे तो वो शे'र कैसे होंगे ?

कोई अन्तरिक्ष पर गीत लिखे और चाँद पर बैठ कर लिखे तो वो गीत कैसा होगा ?

इसी प्रकार

कोई फूल पर कविता काव्य रचे और तितली बन के रचे तो वो काव्य कैसा होगा ?

_________वैसा ही

जैसी कविता अपने सृज दी है सुधा जी !

यों लगता है मानो आपने उस मंजी पर लेट कर ख़्वाबों में ताना बाना रचा है इस काव्य-मंजरी का ॥

मन भर गया .........गदगद हो गया..........

आपकी लेखनी का सार्वजनिक अभिनन्दन !

हार्दिक अभिनन्दन !

नीरज गोस्वामी said...

सुधा जी क्या कहूँ...मंजी शब्द का प्रयोग और उस पर रची आपकी ये रचना अद्भुत है...रोमांचित कर देती है...अन्दर से भिगो भी देती है...लाजवाब लेखन...मेरी बधाई स्वीकार करें...

नीरज

अर्शिया said...

रोजमर्रा की जिंदगी से उपजी एक अच्छी कविता।
--------
स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाती तकनीक।
चार्वाक: जिसे धर्मराज के सामने पीट-पीट कर मार डाला गया।

ओम आर्य said...

क्या बात है आपके ब्लोग पर पहली बार आया आपकी रचना ने मुझे बहुत ही गहरे उतार ले गयी उन भुले बिसरे पलो मे जहा मै बहुत विरले ही उतर पाता हूँ...........समय क दौर कहे या समय कम पड जाना..........एक खुबसूरत रचना!

ओम आर्य said...

क्या बात है आपके ब्लोग पर पहली बार आया आपकी रचना ने मुझे बहुत ही गहरे उतार ले गयी उन भुले बिसरे पलो मे जहा मै बहुत विरले ही उतर पाता हूँ...........समय क दौर कहे या समय कम पड जाना..........एक खुबसूरत रचना!

Udan Tashtari said...

सुन्दर चित्रण किया है आपने उम्दा भावों का, बधाई.

तेजेन्द्र शर्मा said...

सुधा जी

एक और ख़ूबसूरत रचना।

आप की कविताएं मन के भीतर तक छू जाती हैं। गहराई से लिखी गईं और गहराई तक असर करती। पंजाबियत की चाशनी इस कविता में विशेष असर पैदा करती है।

बधाई

तेजेन्द्र शर्मा
महासचिव - कथा यू.के.
लंदन

तेजेन्द्र शर्मा said...

सुधा जी एक बार फिर एक ख़ूबसूरत रचना।

गहराई से लिखी और गहराई तक असर करती आपकी रचनाएं विदेशों में रची जा रही हिन्दी कविता का श्रेष्ठ नमूना हैं।

तेजेन्द्र शर्मा
महासचिव - कथा यू.के.
लंदन

chandrapal said...

बहुत ही वैचारिक और सार्थक रचना है ये. सच तो यह है की आपने स्थापित और तथाकथित बडे लेखकों को चुनौती दी है. जिस ईमानदारी के लिये साहित्य य कविता जाने जाते है उसे आपने बखुबी निभाया है. आपको और आपकी कलम को ढेरों बधाई.

Atmaram Sharma said...

जैसे दृश्यों का मेला सा लग जाता है. कविता के बिम्ब असर डालते हैं. मार्मिक कविता के लिए बहुत धन्यवाद.

cmpershad said...

बचपन की मासूमियत का सुंदर चित्रण। बडे़ होने के बाद तो उसी मौसी के बदन से दुर्गंध आएगी, उसकी झुर्रियों में बदसूरती तलाशी जाएगी.......:(

Pran Sharma said...

Aap shreshth kavyitri hain.kahte
hai ki rachnakar kee har rachna
shreshth nahin hotee hai lekin
main dekh rahaa hoon ki 2009 mein
aapkee har rachnaa ( kavita
ho,kahani ho ,sansmaran ho yaa
saakshaatkaar ho) ek se badh kar
ek hai.Is behtreen kavita ke liye
bhee meree badhaaee aur shubh kaamna.

बलराम अग्रवाल said...

नेत्रहीन मौसी ने/कितने प्यार से/सूत काता, अटेरा और/चौखटे को बुना था--इन पंक्तियों में अतीत अपनी पूरी गरिमा के साथ विद्यमान है। सूत कातना किसे कहते हैं--इस बात को आज की पीढ़ी शायद किताबों के जरिए जानती हो, लेकिन 'अटेरना' किसे कहते हैं और फिर 'चौखटा' क्या होता है--इन शब्दों को तो आज क्या गए जमाने के भी सिर्फ वही लोग जानते हैं जिन्होंने गाँव को अपने भीतर जिया है। पूरी कविता बचपन की भव्य दुनिया में ले जाती है। आप धन्य हैं।

shashi padha said...

यादों के गलियारों से लौट आऊँ
तो लिखूँ
भीगी आँखों के कोरों को सुखा लूँ
तो लिखूँ
मन को थोड़ा तो समझा लूँ
तो लिखूँ

सुधा जी, हम सब उसी परिवेष में पैदा हुए,पले,
हम सब ने किसी की आँखों से सप्तऋषि देखे
बचपन के वो अमूल्य क्षण ही हमारे अन्तर्मन
की कोमलता को सींचते रहते हैं ।
क्या कहूँ,मैं अभी तक उस आँगन की मंजी पर चैन से सोई हूँ ।
कोई वक्त से कह दे -ज़रा ठहर जा !!!

सस्नेह
शशि पाधा

रूपसिंह चन्देल said...

सुधा जी

निम्न पंक्तियों के बाद अपनी बात कहना चाहता हूं :

जीवन की आपाधापी से

भाग जब भी उस

चारपाई पर लेटती हूँ,

तो मौसी का

बदन बन वह

मनुहार और दुलार देती है .

मन को झकझोर देने वाली - आप्लावित कर देने वाली कविता है यह. मौसी मेरी आंखों के सामने घूमने लगीं और कविता में मैं अपना बचपन खोजने लगा.

बहुत - बहुत बधाई इतनी अच्छी कविता लिखने के लिए.

चन्देल

Devi Nangrani said...

सुधा जी
कैसे कहूं कुछ कहूं गर तो क्या मैं
सब साँझा साँझा सा लगता है,

वो आंगन, वो मिटटी तेरी मेरी इक है
वही देश धरती तेरी मेरी इक है!

कहाँ हो सके हैं जुदा उससे हम तुम
दे ममता जो जननी तेरी मेरी इक है!

भुलाकर भी भूले कहाँ 'कल' है अपना
वो ममता सी मासी तेरी मेरी इक है!

सुधा शब्दों में रिशतों की ममता को फिर से जीवित करने के लिए बधाई!
ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ
देवी नागरानी

ashok andrey said...

aur phir andar dhaseen
mousee kee band aankho men dekhte--
mousee ko dikhtaa hai---
tbhee to taaron kee pehchaan hai,

hmaaree maasumiyat par hans detee
aur karvat badal kar so jaatee,
chandan kee khushboo vaale ooske badan par taangen rakhte hee,
ham neend kee aagosh men ludak jaate

bahut khobsurat panktiyan hain is kavitaa kee, man ko gehre chhu jaatee hain inme chhipee rishto kee gand hame apne aagosh me le letee hai.
itnee sundar rachnaa ke liye meree aor se badhai sveekaren.

ashok andrey

Rajey Sha said...

बेरंग चारपाई
...........
बचपन और जवानी का
पालना थी वह.

बहुत ही खूब भाव जाहि‍र कि‍ये हैं आपने।

"अर्श" said...

सुधा दीदी को प्रणाम,
आपकी इस कविता ने आँखों को सिसकियाँ लेती देखती रहीं.. कमाल की बात कही
है आपने क्या खूब अपनापन इस कविता के जरिये झलक रहा है ,.. आपके
लेखनी पे कुछ कहूँ इतनी सामर्थाता नहीं मेरे में ....


सलाम
अर्श

Anonymous said...

सुधा दीदी जब आप लिखने बैठती हैं तो जिन छोटी -छोटी बातों को, यादों को ,भावनाओं को आप जिस कोमलता से छूती हैं , वो सीधा मन के भीतर उतर जाता है , वो मौसी, वो खटिया, वो चाँद , वो खुला आसमान ,वो आँचल की गर्माहट.मन के भीतर उतर कर मन की गहराई को नाप लेती है फिर सीधा उसे आत्मा से जुड़ा देती है. शायद इसी लिए आप का नाम सुधा है . आप के लेखन में कोमलता है, गहराई है ,नपेतुले सटे शब्द हैं और इक लावा है ,जो जीवंत धधकता है . मैं आपके जादुई लेखन के लिए आपका अभिनन्दन करती हूँ और बधाई देती हूँ
साभार
रेखा भाटिया

ह्रदय पुष्प said...

मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी - सादर
---------------------
राकेश कौशिक

Romesh Shonek said...

Sudha ji,
aapkaa desii man Jaalandhar baar baar lauTtaa hai, kabhi papa ko , kabhi bhaiyaa ko aur kabhii andhii mausii ko yaad kartaa hai. choTii choTii batoon se jholii bhar laataa hai aur yahaan laakar upnii jholii hamaare saamne khol detaa hai. bahut sundar likh rahii hain aur khuub saaraa likh rahii hain. Romesh Shonek