उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक पत्रिका ''हिंदी चेतना'' का विशेषांक
आज प्रैस में गया है और थोड़ी सी राहत मिली है. जिन दोस्तों को
मेरे ब्लाग का रंग पसंद नहीं आया, उनका सन्देश मैंने
अलबेला खत्री जी को पहुँचा दिया है।
उन्होंने ही यह ब्लाग बना कर मुझे सौंपा है।
देखती हूँ कि वह इसका क्या करते हैं?
मेरे ब्लाग पर आने
और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत करने के लिए धन्यवाद!
खोज
गिरा नज़र से जो
फिर उसका कहाँ ठिकाना है;
बोझ गुनाहों का स्वयं ही उठाना है.
डार से बिछुड़ कर
पूछे कोई उड़ने वाले से;
कहाँ मज़िल उसकी, कहाँ उसे जाना है.
क्या जानें रहने वाले
सुख औ' मदहोशी के जनून में;
वीरान बस्तियों को कैसे सजाना है.
किस लिए फैला
वहशत और गरूर का धुआं;
खाली करना है मकान, जो बेगाना है.
तनातनी ने
मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में;
दिल कई बनाए नफ़रत का कारखाना है.
खोजे सुधा
अब किस जगह उस को;
इंसानियत हुई क़त्ल जहाँ उसे बैठाना है.
सुधा ओम ढींगरा
Friday, July 24, 2009
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