रक्षा बंधन ख़ुशी के साथ -साथ मुझे उदासी भी दे जाता है.
आज के दिन मुझे अपने बड़े भैया बहुत याद आते हैं.
तीन साल पहले वे मुझे छोड़ कर चले गए.
मैं उनसे साढ़े दस साल छोटी हूँ. हम दो ही बहन- भाई थे.
तीन साल पहले तक मैं मुन्ना थी.
उनके जाने के बाद मैं अचानक सुधा बन गई.
ऐसा लगा कि बड़ी हो गई हूँ . कोई मुन्ना कहने वाला नहीं रहा.
आज मैं जो भी हूँ, उन्हीं की बदौलत हूँ.
उन्होंने मेरी खातिर मम्मी-पापा से बहुत डांट खाई.
मैं चंचल और चुलबुली थी, भैया धीर, गम्भीर और शांत थे.
मम्मी -पापा डाक्टर थे और वे मुझे डाक्टर बनाना चाहते थे.
और मैं पता नहीं सूरज ,चाँद, तारों में क्या ढूँढती रहती थी?
हवा में उड़ती रहती थी.
भैया भी डाक्टर थे और वे समझ गए थे कि
मैं कभी भी डाक्टर नहीं बन पाऊँगी.
और उम्र भर माँ -पा की झिड़कियाँ खाती रहूँगी.
उन्होंने मुझे वही बनाया जो मैं बनना चाहती थी.
घने वृक्ष सामान उन्होंने मुझे धूप ,बारिश, ओलों , दुःख में बचाए रखा.
ग़ज़ल बहुत अच्छी लिखते थे और मेरी किशोरावस्था में ही
उन्होंने कह दिया था कि मुन्ना तुम आज़ाद पंछी हो खुले
आकाश में विचरण करना , ग़ज़ल तेरे बस की नहीं.
उनकी आकस्मिक मृत्यु ने मुझे बहुत बड़ा आघात दिया.
उनके बाद तो मेरे परिवार के सात जन चले गए,
मायके में कोई बचा ही नहीं.
उनकी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता पर खुश हो लेती हूँ
कि मेरे और भाई भी हैं।
पाती
बादलों के उस पार
है मेरे भाई का घर
ऐ मेरी सखी, पुरवाई
ले जा मेरा संदेसा उसके दर
कहना खड़ी है तेरी बहना
धरती के उस छोर
हाथ में लिए राखी
थाली में चन्दन, रौली, मौली
बर्फी, लड्डू
बाँध कई कलाइयों पर राखी
तेरी कलाई याद है आती
ऐ मेरी सखी, पुरवाई
ले जा मेरी पाती
कहना मेरे भाई को
खुश रहे वह अपने दर
मैं खुश हूँ अपने घर
वादा करती हूँ
नहीं रोऊँगी
तुम भी मत रोना
आज के दिन!
Tuesday, August 4, 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)

